Tuesday, August 16, 2011

शायरी

किसी ने हमसे फ़रमाया उन्हें भी शायरी करना सीखना है,
सुना शायरी किसी को अपनी और घसीटना है |
हमने जवाब दिया, एक आप ही तो कला के कद्रदान हैं,
वरना आज के ज़माने में शायर बन किसे जनता से पीटना है |


फिर उनका भोला चेहरा देख के दिल पसीज गया,
और शायर से एक और शेर फिसल गया;

क्या कहूँ दिल की स्याह किस रंग आएगी,
शायरी बनेगी जब उसकी याद तडपाएगी;
मगर मत करना भूल इसे आजमाने की,
मेरी तो मानी नहीं, तेरी वाली भी भाग जाएगी...

Tuesday, July 26, 2011

दिल चाहता है

बहुत कर चुका हूँ गुनाह की अंकुश,
अब सज़ा पाने को दिल चाहता है |

करता रहा कोशिश आँखों में डूब जाने की,
अब तेरी यादों को भूल जाने को दिल चाहता है|

बहुत मासूम है ये इश्क़ मेरा,
अब समझदार बनने को दिल चाहता है|

इस दिल्लगी से खुशी तो मिली हमें,
अब शान-ए-वीराने को दिल चाहता है|

दीवानगी-ए-दिल तो बहुत समझ ली,
अब अदा-ए-अक़ल पाने को दिल चाहता है|

कितना नासमझ है ये दिल मेरा,
लाख बहलाने के बावजूद तुझे दिल चाहता है...

Wednesday, April 20, 2011

आज चाँदनी से बात की मैंने


आज चाँदनी से बात की मैंने,
धूँधली सी है वो,
मेरा साथ देने में असमर्थता जताती।
या फ़िर अपनी निष्ठा जताती,
कर प्रकाशित मेरी राहों को,
लाख़ रुकावटों से लड़ते।
प्रश्न होते तुच्छ सभी ये,
जब दृष्टिगत है मेरे वो...

Monday, February 21, 2011

एकाकी यात्रा


13-Feb-2011
आखिरी semester कि एक सर्द सुबह । आज बहुत दिनों बाद सुबह जल्दी नींद खुली और ये संयोग व्यर्थ नहीं हुआ । बहुत दिनों बाद मौसम दीवाना हो रहा है और इतना दीवाना कि जैसे सोलानी बार बार मुझे अपने पास बुला रही हो । जब कुछ दोस्तों ने नींद का साथ छोड़ने से इनकार कर दिया, तो फिर और अधिक समय बर्बाद ना करते हुए मैं अपनी द्विपथगामनी (bicycle)  के साथ सोलानी यात्रा पे हो लिया । 
बहुत दिनों से सोलानी मे जा के कविता लिखने कि जो इच्छा थी, वो भी आज पूरी कर ली। वहाँ जा के जो कविता लिखी, वही इस post पे डाल रहा हूँ। और जिन दोस्तों ने वो शानदार सुबह व्यर्थ की, उनके लिये सहानभूति।



आज क्यों अकेले इन राहों पे हो,
इस मासूम सवाल का क्या ज़वाब दूँ ।
संग लिये तेरी यादें चला हूँ,
और हमराही तन्हाई को कैसे भुला दूँ ।

अब तो राहें सोचती हैं मैं क्या करुँगा यहाँ,
पर क्या अकेला इन राहों पे चलुँगा नहीं?
फ़िर गुज़र रहा हूँ इन रास्तों से,
अब कोई याद भूलूँगा नहीं ।

बुलावा तो मुझे मदहोश मौसम का है,
मेहमाननवाजी भी क्या खूब दीवानी है,
फ़िर धीरे से कान में ये क्यों कह गयी हवा,
अधूरे अंकुश के लिए क्यों मेरी रवानी है?

नीर का उत्साह तो किसी से कम नहीं,
गीत ये भांति भांति के गुनगुना रहा,
कितना सुकुन है इस तन्हाई में,
इस बात को यहीं तो समझ पा रहा ।

ये तन्हाई तो एक भाव मात्र है,
ज़ीवन को बाँधे ऐसी दशा तो नहीं,
अंकुश ऐसे जियो कि गम को लगे,
उसके वज़ूद कि कोई वज़ह नहीं।

Friday, December 24, 2010

Yourself

I like to see you bawling,
I like to see your fluster,
I like to see you bedeviled,
I like to face your anger,

I like to see you listless,
I like to know your boo,
B‘coz not I like the truth,
But I love to meet yourself in you.

Sunday, November 21, 2010

दीप

एक दीप की तरह हूँ मैं,
जल कर भी तुझे रोशन कर जाऊँगा ।
रखूँगा तेरी दुनिया को प्रकाशित मैं,
नहीं अपने घर अंधरे की सुध मनाऊँगा ।
महकेगी तेरी देहरी मेरी खुशबु से,
बुझ कर भी तुझे काजल दे जाऊँगा ।
एक दीप की तरह हूँ मैं,
जल कर भी तुझे रोशन कर जाऊँगा ।

Wednesday, September 8, 2010

She

I know how to rule the world,
But she taught me to win hearts;

I know how to hide my grief,
But she taught me to come over it;

I know how to enjoy myself,
But she taught me to feel it;

I know how to live in the world,
But she taught me to make it livable;

I know how to love others,
But she taught me to be lovable;

I know how to apologize,
But she taught me to say sorry;

I know how to be polite,
But she taught me to be humble;

I know how to be independent,
But she taught me to understand people;

I know how to love someone,
But she taught me to respect distances;

I know how to keep you in heart always,
But she taught me how to let one go;

I know how to get her,
But she betrayed her dreams to me.