13-Feb-2011
आखिरी semester कि एक सर्द सुबह । आज बहुत दिनों बाद सुबह जल्दी नींद खुली और ये संयोग व्यर्थ नहीं हुआ । बहुत दिनों बाद मौसम दीवाना हो रहा है और इतना दीवाना कि जैसे सोलानी बार बार मुझे अपने पास बुला रही हो । जब कुछ दोस्तों ने नींद का साथ छोड़ने से इनकार कर दिया, तो फिर और अधिक समय बर्बाद ना करते हुए मैं अपनी द्विपथगामनी (bicycle) के साथ सोलानी यात्रा पे हो लिया ।
बहुत दिनों से सोलानी मे जा के कविता लिखने कि जो इच्छा थी, वो भी आज पूरी कर ली। वहाँ जा के जो कविता लिखी, वही इस post पे डाल रहा हूँ। और जिन दोस्तों ने वो शानदार सुबह व्यर्थ की, उनके लिये सहानभूति।
आज क्यों अकेले इन राहों पे हो,
इस मासूम सवाल का क्या ज़वाब दूँ ।
संग लिये तेरी यादें चला हूँ,
और हमराही तन्हाई को कैसे भुला दूँ ।
अब तो राहें सोचती हैं मैं क्या करुँगा यहाँ,
पर क्या अकेला इन राहों पे चलुँगा नहीं?
फ़िर गुज़र रहा हूँ इन रास्तों से,
अब कोई याद भूलूँगा नहीं ।
बुलावा तो मुझे मदहोश मौसम का है,
मेहमाननवाजी भी क्या खूब दीवानी है,
फ़िर धीरे से कान में ये क्यों कह गयी हवा,
अधूरे अंकुश के लिए क्यों मेरी रवानी है?
नीर का उत्साह तो किसी से कम नहीं,
गीत ये भांति भांति के गुनगुना रहा,
कितना सुकुन है इस तन्हाई में,
इस बात को यहीं तो समझ पा रहा ।
ये तन्हाई तो एक भाव मात्र है,
ज़ीवन को बाँधे ऐसी दशा तो नहीं,
अंकुश ऐसे जियो कि गम को लगे,
उसके वज़ूद कि कोई वज़ह नहीं।