Tuesday, December 27, 2011

ऐ खुदा


आज ज़िंदगी थमती जा रही है,
मगर कुछ है जो साँसों की गिनती ख़त्म नही होती |
खामोश है सारा जहाँ, सारी फिजायें,
कहाँ से आती तेरी गूँज है जो मुझे रुकने नही देती |
आज है मेरी आवाज़ किसी कब्र की खामोशी सी,
कैसे शब्द हैं की ज़रूरत-ए-बोल-ए-खुद महसूस नही होती |
नामालूम मकसद-ए-ज़िन्दगी अपना,
मगर तेरे साथ के साथ कोई कमी रूबरू नही होती |

थक गया हूँ सबसे लड़ते लड़ते,
एक तेरा साथ है जो मेरी हार होने नही देता |
शुक्रिया तेरा खुदा मुझे अपनाने का,
अंकुश तेरे बिना ये लम्हा ज़िन्दगी नही होता |

4 comments:

Saikat said...

* तेरे बिना ये लम्हा ज़िन्दगी नही होता *
Awefome :) :)

Ankush Agrawal said...

Thanku Saikat Das... khali baith ke purani poems padh raha hai kya?

abhishek said...

tarif karna bekar hai,,jab bhi likhte ho to dil ko chuh lete ho,,,bahut ache..

Ankush Agrawal said...

wah Abhishek babu.. kya baat kah di yaar tumne :)