Sunday, April 26, 2009

अनजान

आज फिर रुत मस्त, मध्दम हवा और मौसम मस्ताना है,
जज्बाती कहो या दिवाना मगर दिल ने छेड़ा तराना है |
आशिक़ी मे डूबा हूँ, बस इश्क़ का फसाना है,
वो आज है यही, और उसे दिल का हाल बताना है |
कैसे कहूँ तुम्हे, तुम्हे अपना बनाना है,
जानती तो हो फिर क्यों ये अंदाज-ए-अंजाना है |
रुक जाओ दो पल, अभी तो सुहानी शाम का आगाज़ है,
पर बात शुरू करूँ कैसे, पढ़ लो इन आँखों को जो कहती यही राज है |
तुम हो मेरी और नही कोई सनम तुम्हारा दूजा है,
चाहता हूँ ले लूँ बाहों मे उसे, जो मेरी प्रियतमा मेरी पूजा है |
पर इस पूजा की सफलता क्यों आसान नही है,
तप किया है मैने पर पाया क्यों वरदान नही है |
वो फिर दूर है मुझसे, भले ही तुम्हे दिख पास रही है,
कोई है तरीका तो बताए मुझे, मुझे तो नही कोई आस रही है |
कह लो तुम मुझे अकेला, पर अकेला कहा मैंने कभी खुद को पाया है,
खुशी मिले है उसे जहाँ की तो मैने भी गम को आजमाया है |
कहने को तो आज बिल्कुल तन्हा हूँ, पर साथ मेरे सच्ची साथी तन्हाई है,
फ़िक्र ना कर ऐ मासूम मेरे लिए, ये पहली दफ़ा नही उसकी रुसवाई है |
सोचा था उससे दूर जाने का, दिल ने कुछ चैन पाने का,
मगर दिल ने ये कैसा मर्ज़ लिया है, उसके बिन नही जी पाने का |
ये मोहब्बत है दोस्त मेरे, जो कहाँ किसी को समझ आई है,
जो कभी झुका नही उसने कहा की ये पढ़ाई है |
ये आँखों की भाषा पढ़ना नही कोई खेल है
ये कोई सस्ता सौदा नही दो दिलों का मेल है |
कैसे कह दूँ की तुम्हारे प्यार मे ही अंकुश  डूबा है,
कहीं रूठ गयी तुम तो तुम्हारे सिवा नही मेरा कोई दूजा है |
पता नही मेरी बातों को तुम कब समझ पाओगी,
मेरे सच्चे प्यार को कब सफल करवाओगी,
दिल की बात को होठों पे लाना ज़रूरी नही,
बस तुम्हें चाहना है, तुम्हे पाना ज़रूरी नही...

No comments: