आज फिर सावन की सलोनी घटा छाई है,
धीमे से मेरे कानों में जाने क्या बुदबुदाई है|
छुपा रखा था दिल अपना सीने में कहीं,
और पहली बारिश की बूँदें हिय को छू आई हैं |
बात ये नहीं की दिल धड़का पहली बार है,
ना ही तुझपे आया पहली बार प्यार है |
मेरे नयनों में बस तू ही एक बसी है,
पर जब मिलें है तुझसे नयन, और भी ज़्यादा छाया खुमार है |
बाहर वर्षा से तृप्त होती सृष्टि, मगर
भीतर क्यों मासूम दिल बेकरार है |
मत स्पर्श होने दे इन चंचल बूँदों का अपने तन से,
अमृत बन जाने का इनपे जुनून सवार है |
खुशी में झूम रही है पगली बारिश आज,
क्या पहली बार सावन ने तेरा आँचल पार किया है |
या ये बस उन नज़रों का कमाल है,
जिन्होनें सीधे मेरे नासमझ दिल पे वार किया है |
5 comments:
ok... confession.... teri ye pehli 'kavita' hai jo mujhe sahi me pasand aayi hai.... gud work bro... :)
Aur ye comment(s) delete karne waale log mujhe kuch khaas pasand nahi aate :P
mast hai ... :)
thanks all...
@Ahuja.. baaki sahi me nahi to kaisi pasand aati thi? :O
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