तेरी आँखों की मस्ती मुस्कुराती है मुझे,
लम्हा-ऐ-अलविदा पे तेरी ख़ामोशी समझ नहीं आती॥
सर-आँखों पे तेरा इंकार ऐ दिलरुबा,
मेरे किस्से पे शर्माती तेरी नजरें समझ नहीं आती॥
कहा था तुमने चल न सकोगी उम्र भर साथ मेरे,
साथ चले मीलों जिसपे हम, वो राह समझ नहीं आती॥
समझता हूँ तेरे शब्दों को बखूब मैं,
शब्दों से इतर तेरी भंगिमाएं समझ नहीं आती॥
ये शर्माते जज्बात हैं या दीवानापन मेरा,
मेरे दिल को अदा-ऐ-महबूब समझ नहीं आती॥
समझता हूँ मर्ज़-ऐ-इश्क़ और इलाज़ भी जनता हूँ,
तू मरीज़-ऐ-इश्क़ नहीं ये बात समझ नहीं आती॥
तेरे इंकार से संभल रहा मैं, बदल रहा मैं,
तेरे न बदलने की वजह सिवाय इश्क़ के समझ नहीं आती॥
अनुलेख: मैं मुंशी प्रेमचंद जी का हमेशा से प्रंशसक रहा हूँ। मुंशीजी की लेखनशैली में आप तत्कालीन भाषा या कहा जाए तो बोली का प्रयोग पाएंगे। मुंशीजी ने किसी सिर्फ हिंदी या उर्दू का प्रयोग ना करते हुए आमजन की भाषा में साहित्य की रचना की। आज की ये ग़ज़ल भी मैंने उसी तरह हिंदी और उर्दू के प्रचलित शब्दों द्वारा लिखी है। रचना में इतना भाषा का मिश्रण पहली बार किया है अतः गलतियाँ सम्भविक हैं। Please feel free to note down any comment you have...
लम्हा-ऐ-अलविदा पे तेरी ख़ामोशी समझ नहीं आती॥
सर-आँखों पे तेरा इंकार ऐ दिलरुबा,
मेरे किस्से पे शर्माती तेरी नजरें समझ नहीं आती॥
कहा था तुमने चल न सकोगी उम्र भर साथ मेरे,
साथ चले मीलों जिसपे हम, वो राह समझ नहीं आती॥
समझता हूँ तेरे शब्दों को बखूब मैं,
शब्दों से इतर तेरी भंगिमाएं समझ नहीं आती॥
ये शर्माते जज्बात हैं या दीवानापन मेरा,
मेरे दिल को अदा-ऐ-महबूब समझ नहीं आती॥
समझता हूँ मर्ज़-ऐ-इश्क़ और इलाज़ भी जनता हूँ,
तू मरीज़-ऐ-इश्क़ नहीं ये बात समझ नहीं आती॥
तेरे इंकार से संभल रहा मैं, बदल रहा मैं,
तेरे न बदलने की वजह सिवाय इश्क़ के समझ नहीं आती॥
अनुलेख: मैं मुंशी प्रेमचंद जी का हमेशा से प्रंशसक रहा हूँ। मुंशीजी की लेखनशैली में आप तत्कालीन भाषा या कहा जाए तो बोली का प्रयोग पाएंगे। मुंशीजी ने किसी सिर्फ हिंदी या उर्दू का प्रयोग ना करते हुए आमजन की भाषा में साहित्य की रचना की। आज की ये ग़ज़ल भी मैंने उसी तरह हिंदी और उर्दू के प्रचलित शब्दों द्वारा लिखी है। रचना में इतना भाषा का मिश्रण पहली बार किया है अतः गलतियाँ सम्भविक हैं। Please feel free to note down any comment you have...