Tuesday, December 27, 2011

ऐ खुदा


आज ज़िंदगी थमती जा रही है,
मगर कुछ है जो साँसों की गिनती ख़त्म नही होती |
खामोश है सारा जहाँ, सारी फिजायें,
कहाँ से आती तेरी गूँज है जो मुझे रुकने नही देती |
आज है मेरी आवाज़ किसी कब्र की खामोशी सी,
कैसे शब्द हैं की ज़रूरत-ए-बोल-ए-खुद महसूस नही होती |
नामालूम मकसद-ए-ज़िन्दगी अपना,
मगर तेरे साथ के साथ कोई कमी रूबरू नही होती |

थक गया हूँ सबसे लड़ते लड़ते,
एक तेरा साथ है जो मेरी हार होने नही देता |
शुक्रिया तेरा खुदा मुझे अपनाने का,
अंकुश तेरे बिना ये लम्हा ज़िन्दगी नही होता |

Monday, December 26, 2011

जब मैं चला जाऊँगा


जो ना रहूं कल मैं तो,
तुम ना आँसू बहाना;
तेरी मुस्कुराहट में जान है मेरी,
एक बात तो मेरी आज़माना|

तेरी खामोशी से तड़प जाता हूँ मैं,
तेरे गम से मर के भी ना चैन पाऊँगा;
कुछ महसूस करो तो साथ बिताए लम्हें करना,
तेरी हँसी में मैं भी गुनगुनाऊँगा;

छोड़ जाना तुझे कैसे मुमकिन होगा
दिल में हूँ तो तेरी सांसो मे भी मुस्कुराऊँगा;
जब मैं चला जाऊँगा...

Monday, September 5, 2011

सच

आज हर भीड़ का हिस्सा हूँ मैं,
कोई 'अपने' गैरों में गिने तो चैन आये |

मेरे मुस्कराहट की कायल है दुनियाँ
कोई जी भर के रुला जाए तो चैन आये |

बहुत हसीन तस्वीर है यादों की मेरे पास,
कोई उनमे रंग भर दे तो चैन आये |

मीठी धुनें गूंजती हैं चहुं और, 
कोई सच्ची डांट सुना जाए तो चैन आये |

मीठी नींद की गोद में होती है रात मेरी,
कोई बेवक्त जगा जाए तो चैन आये |

बड़ी तल्लीनता से कट रहें हैं दिन अब,
कोई घड़ी भर भी बैचेन कर जाए तो चैन आये |

Tuesday, August 16, 2011

शायरी

किसी ने हमसे फ़रमाया उन्हें भी शायरी करना सीखना है,
सुना शायरी किसी को अपनी और घसीटना है |
हमने जवाब दिया, एक आप ही तो कला के कद्रदान हैं,
वरना आज के ज़माने में शायर बन किसे जनता से पीटना है |


फिर उनका भोला चेहरा देख के दिल पसीज गया,
और शायर से एक और शेर फिसल गया;

क्या कहूँ दिल की स्याह किस रंग आएगी,
शायरी बनेगी जब उसकी याद तडपाएगी;
मगर मत करना भूल इसे आजमाने की,
मेरी तो मानी नहीं, तेरी वाली भी भाग जाएगी...

Tuesday, July 26, 2011

दिल चाहता है

बहुत कर चुका हूँ गुनाह की अंकुश,
अब सज़ा पाने को दिल चाहता है |

करता रहा कोशिश आँखों में डूब जाने की,
अब तेरी यादों को भूल जाने को दिल चाहता है|

बहुत मासूम है ये इश्क़ मेरा,
अब समझदार बनने को दिल चाहता है|

इस दिल्लगी से खुशी तो मिली हमें,
अब शान-ए-वीराने को दिल चाहता है|

दीवानगी-ए-दिल तो बहुत समझ ली,
अब अदा-ए-अक़ल पाने को दिल चाहता है|

कितना नासमझ है ये दिल मेरा,
लाख बहलाने के बावजूद तुझे दिल चाहता है...

Wednesday, April 20, 2011

आज चाँदनी से बात की मैंने


आज चाँदनी से बात की मैंने,
धूँधली सी है वो,
मेरा साथ देने में असमर्थता जताती।
या फ़िर अपनी निष्ठा जताती,
कर प्रकाशित मेरी राहों को,
लाख़ रुकावटों से लड़ते।
प्रश्न होते तुच्छ सभी ये,
जब दृष्टिगत है मेरे वो...

Monday, February 21, 2011

एकाकी यात्रा


13-Feb-2011
आखिरी semester कि एक सर्द सुबह । आज बहुत दिनों बाद सुबह जल्दी नींद खुली और ये संयोग व्यर्थ नहीं हुआ । बहुत दिनों बाद मौसम दीवाना हो रहा है और इतना दीवाना कि जैसे सोलानी बार बार मुझे अपने पास बुला रही हो । जब कुछ दोस्तों ने नींद का साथ छोड़ने से इनकार कर दिया, तो फिर और अधिक समय बर्बाद ना करते हुए मैं अपनी द्विपथगामनी (bicycle)  के साथ सोलानी यात्रा पे हो लिया । 
बहुत दिनों से सोलानी मे जा के कविता लिखने कि जो इच्छा थी, वो भी आज पूरी कर ली। वहाँ जा के जो कविता लिखी, वही इस post पे डाल रहा हूँ। और जिन दोस्तों ने वो शानदार सुबह व्यर्थ की, उनके लिये सहानभूति।



आज क्यों अकेले इन राहों पे हो,
इस मासूम सवाल का क्या ज़वाब दूँ ।
संग लिये तेरी यादें चला हूँ,
और हमराही तन्हाई को कैसे भुला दूँ ।

अब तो राहें सोचती हैं मैं क्या करुँगा यहाँ,
पर क्या अकेला इन राहों पे चलुँगा नहीं?
फ़िर गुज़र रहा हूँ इन रास्तों से,
अब कोई याद भूलूँगा नहीं ।

बुलावा तो मुझे मदहोश मौसम का है,
मेहमाननवाजी भी क्या खूब दीवानी है,
फ़िर धीरे से कान में ये क्यों कह गयी हवा,
अधूरे अंकुश के लिए क्यों मेरी रवानी है?

नीर का उत्साह तो किसी से कम नहीं,
गीत ये भांति भांति के गुनगुना रहा,
कितना सुकुन है इस तन्हाई में,
इस बात को यहीं तो समझ पा रहा ।

ये तन्हाई तो एक भाव मात्र है,
ज़ीवन को बाँधे ऐसी दशा तो नहीं,
अंकुश ऐसे जियो कि गम को लगे,
उसके वज़ूद कि कोई वज़ह नहीं।