खो चूका हूँ इतना कुछ मैं की
अब मिलने की आस से डर लगता है।
ठुकराया गया हूँ कुछ इस तरह की
अब चाहत की चाह से डर लगता है।
दिल में मेरे मोहब्बत-ए-जहाँ है तो क्या
रुसवाई-ए-हुस्न से डर लगता है।
खायी है ठोकर इस राह में कुछ ऐसी की
राह-ए-मोहब्बत में नज़र से डर लगता है।
डर नहीं मुझे मेरे दास्ताँ-ए-दिल बयां करने का
उनके तेरे आँखों का पानी बन जाने से डर लगता है।